वह दिखने में एक साधारण ग्रामीण युवती है… उनके व्यक्तित्व में न आधुनिकता का प्रदर्शन दिखता है न ऊँचे शब्दों का कोई आडंबर…
लेकिन अपने धर्म और संस्कारों के प्रति उसकी चेतना इतनी प्रखर निकली कि उसने पूरे समाज को झकझोर दिया।
मध्यप्रदेश के झाबुआ की रहने वाली संगीता भाबर का विवाह 17 अप्रैल 2025 को आशीष मचार से हुआ। एक नवविवाहिता की तरह जब वह पहली बार अपने ससुराल पहुँची, तो उसे घर के मंदिर में ले जाया गया। लेकिन वहाँ जो उसने देखा, उसने उसके मन को भीतर तक विचलित कर दिया – मंदिर में क्रॉस टंगा हुआ था।
जब संगीता ने इस विषय में अपने पति और परिवार से बात की, तब उसे ज्ञात हुआ कि वर्षों पहले पूरा परिवार ईसाई मत अपना चुका है, किन्तु बाहरी रूप से स्वयं को हिन्दू ही बताता है।
यह सुनते ही संगीता ने स्पष्ट शब्दों में कह दिया –
“मैंने विवाह एक हिन्दू परिवार में किया है। मैं अपने धर्म और आस्था से समझौता नहीं कर सकती।”
18 अप्रैल 2025 को ही उसने अपना निर्णय सुना दिया कि वह केवल सनातन धर्म को मानने वाले परिवार के साथ ही रहेगी। जब उसकी बात को गंभीरता से नहीं लिया गया, तब उसने साहसपूर्वक घर छोड़ दिया और प्रशासन से शिकायत की।
इसके बाद जो हुआ, उसने पूरे क्षेत्र को चौंका दिया।
गाँव के लोग संगीता के घर पहुँचे। चर्चा हुई, आत्ममंथन हुआ, और अंततः परिवार सहित अनेक लोगों ने पुनः सनातन परंपरा में लौटने का संकल्प लिया। तब जाकर संगीता ने अपनी शिकायत वापस ली।
आज के समय में, जहाँ लोग सुविधा के लिए अपने सिद्धांत बदल लेते हैं, वहाँ एक साधारण ग्रामीण बेटी ने यह सिद्ध कर दिया कि धर्म केवल पूजा-पाठ नहीं, बल्कि आत्मसम्मान और पहचान का विषय भी होता है।
संगीता भाबर केवल एक नाम नहीं, बल्कि अपनी आस्था पर अडिग रहने वाली उस चेतना का प्रतीक है, जो परिस्थितियों से नहीं डिगती।
ऐसी धर्मनिष्ठा, ऐसा साहस और ऐसा आत्मविश्वास विरले ही देखने को मिलता है!
(राज सिंह)



