Friday, July 3, 2026
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Poetry by Manmeet Soni:  दादी की बेचैनी और पानी की नादानी

Poetry by Manmeet Soni: प्यारी दादी का भोलापन और पानी के साथ उनका रिश्ता हमारे जीवन में एक मीठी स्मृति बन कर हमारे साथ चलता है..पढ़िये मनमोहक कवि मनमीत की मनभावन कविता.. 

Poetry by Manmeet Soni: प्यारी दादी का भोलापन और पानी के साथ उनका रिश्ता हमारे जीवन में एक मीठी स्मृति बन कर हमारे साथ चलता है..पढ़िये मनमोहक कवि मनमीत की मनभावन कविता.. 

शाम के छह बज रहे हैं
दादी बेचैन हो रही है :
पानी क्यों नहीं आया अब तक?
जब कि पौने छह बजे ही आ जाता है पानी!

क्या पानी कोई मुसाफ़िर है?
क्या पानी किसी बस में बैठकर आ रहा है?
क्या पानी अभी रेल में सवार है?
क्या पानी गधागाड़ी, ऊंटगाड़ी या बैलगाड़ी पर आएगा?

हाँ!
पानी आएगा
बरगद वाले कुएँ से
बहुत गहरे कुएँ से
जिसमें छोटे बच्चे पत्थर फेंक कर सेकंड गिनते हैं
कि कितने सेकंड लगे पत्थर को गिरने में
पानी आएगा
गोगाजी की मेड़ी वाले कुएँ से
जिसमें अभी अभी माँ बनी स्त्री
अपने स्तन से दूध की धार छोड़ती है
कुएँ से प्रार्थना करती है :
“मेरा स्तन तेरे पानी की तरह भरा रहे!”
“तेरा पानी पानी मेरे स्तन की तरह लबालब रहे!”
पानी आएगा
“मोची-वाले” मोहल्ले के कुएँ से
जहाँ अंग्रेजों से लड़ने के साथ साथ
अपने ही भाइयों से जंग लड़नी पड़ी मोचियों को
कि पानी तो पानी होता है
कि पानी की कोई जात नहीं होती!

दादी ले आई है –
एक घड़ा
एक बाल्टी
चार टोपिये
और
एक सुराही…
पांच दिनों का पानी भर लिया है दादी ने
इतना पानी भरकर
दादी इतनी ख़ुश है
जैसे अगर देस में कल को कभी अकाल पड़ा
तो घर में पानी की कमी नहीं होगी!

दादी
जब बाल्टी में पानी भरती है
तो बाल्टी जैसी लगती है
घड़े को भरती हुई
घड़े के आकार की
सुराही को भरते हुए
दादी की गर्दन
सुराही की गर्दन से एकमेक हो जाती है
और
टोपियों को भरते हुए
दादी से छन छन छन की आवाज़ आती है!

दादी
कितने प्यार से बाँधती है
एक सफ़ेद कपड़ा
पीतल की टूँटी के मुँह पर
दादी को
कई तरह के पानियों की पहचान है
जैसे : फ्लोराइड वाला पानी!
जैसे : मरे हुए जानवर वाला पानी!
जैसे : मिट्टी मिला हुआ पानी!
जैसे : बरसात का पानी!
जैसे : काई लगा हुआ पानी!

दादी
पानी से बात भी करती है
जो बातें दादी किसी से नहीं करती वह पानी से करती है :
कहती है :
“बांनै गयाँ तेरा बरस हुयग्या! कीनै रोऊँ! न औलादां सुणे न भूआं!”

दादी
बूढी हो गई
वरना उसका बस चले तो सिर पर चक ले
सुराही, घड़े, बाल्टी और टोपिये
देवर नहीं है दादी का कोई
वरना दादी गीत गाए :
“देवरिया! म्हारो घड़ो उतार द्यो नी / म्हारी पतली कमर बलखावै है!”
ननद नहीं है दादी की
वरना वह परीक्षा ले अपने पति की
कि हर्ष की तरह
पत्नी आभलदे का घड़ा उतारेगा या अपनी बहन जीण का?

दादी!
ऐ साफ़ पानी की नहर
ऐ बरसात के पानी की कुईं
ऐ मीठे पानी की बोरिंग
ऐ चमड़ी और हड्डी और माँस की पारदर्शी टूँटी…
कहाँ से आई है तू?
मेरे पास आ..
मैं तेरे गालों पर मलूँ पानी
तेरे मेंहदी लगे बालों को धोऊं पानी से
तेरे पांवों का मैल उतारूँ
तेरी हथेलियों का खुरदरापन मेटूँ पानी से…

पानी
तू कितना मीठा हो गया है
मेरी दादी को छूकर –
और सुन बे समय!
भाप होने से पहले-पहले
मेरी दादी
घड़े में
बाल्टी में
सुराही में
टोपियों में
इतना पानी छोड़ कर जाएगी –
कि मेरे देस में कभी अकाल नहीं पड़ेगा!
(मनमीत सोनी)
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